Wednesday, 26 March 2014

छूटता बंधन-8




 छूटता बंधन-8

 दो एक दिनों से भाषा में काफी सुधार आया हैं राजनीतिज्ञों के ,  असला  तक  पहुँच  गए  कुछ  मसला नदारद हैं। तथ्य के नाम पर मिथ्या भी बखूब चला रहे हैं कुछ। मुझे यकीन और डर हिँसा और व्यक्तिगत आरोपो  का  हैं। "खुनी आत्मा ", "देश का दुशमन" आदि आदि विशेषण सुन के अगर उबकाई न आये तो निश्चित रूप से हममे  "भक्तो" और "सेनाओं " कि मानसिकता आ रही है। कैसे न होगी वितृष्णा इन अल्फाज़ो से , मुझे कोई समझाए। 
सहाफी या पत्रकार से अपना भय तथा प्रेम  छूटता बंधन-४ में ही वर्णित कर चुका हूँ।  विगत ही इनकी भाषा भी  सुनी थी एक चैनल पर।  एक अपरिपक्व प्रार्थी की तुलना दावुद इब्राहिम और आशाराम से कर डाली मेरे त्रि -ईष्ट  के एक भाग ने। अरे ख़त देख मजलूम ताड़ने वालों कुछ तो मर्यादा बनाए रखिए।  आपकी निष्पक्षता के हम खाकसार कायल हुए थे। नेताओं का चरित्र  छोड़िये , दर्शकों की तथाकथित स्व -आडम्बरित "इंटेलिजेंस " का ख्याल तो आग्रहित है। वैसे  हम ख़ाक़सारों की बुद्धिमत्ता की दुहाई आप अपने विचारों की पुष्टि के लिए बखूब इस्तेमाल करते है। 

"सोशल  मीडिया "  की  तो  बात ही निराली हैं।  "सेना " कब अपनी जश्न -ए - मोहब्बत का रुख  आपकी तरफ कर दे ,इसका  अभाश  मुझे थोडा-बहुत हो गया हैं। और ज्यादा अजीबो -गरीब हैं  "twitter"  की माया। 
लम्बी छुट्टी के दौरान किशोर पुत्र , भतीजों  और भाँजो से प्रेरित होकर मैंने  भी  डुबकी  मारी।  कुछ मातहत पहले से ही विराजमान थे। यकीन मानिए जब सुबह 8  से  शाम 8  तक  बीसेक साल ड्यूटी करने के अभ्यस्त को फ़ुर्सत मिलती हैं तो वो सब कुछ कर लेना चाहता है , अपने पुरे शौक निकलना चाहता हैं 

मुद्दत से मिली थी इस ख़ाक़सार को ये शुकून औ  फुर्सत 
जी ले ज़रा अपने लिए , ये नायाब वक़्त भी होगा रुखसत। 

अब वहाँ भी हकीम , शिक्षक कम मिले , अलबत्ता पत्रकार भरे मिले ।  एक नामी -गिरामी अर्थशास्त्र के  शिक्षक से सानिघ्य बढ़ा और मुझे अपनी अँग्रेज़ी वाली " थ्री -टियर -गवर्नेंस " पर समय बिताने कि प्रेरणा निरंतर मिलने लगी। उनसे मेरा संपर्क "ट्विटर" से ही चलता रहा। इस लघु सामाजिक-माध्यम पर खाली समय में मैं दूसरो की राजनीतिक भक्ति का परिहास  भी करने  लगा। उनकी तत्परता और "रायता फैलाने " की  अदा से दंग हो गया।  ऐसी "लॉयल्टी " का एक हिस्सा भी  अपने कंपनी में लागु कैसे करुँगा , उपाय सोचने लगा। 

एक अभिजात्य "aristocrat " जो कभी  "मुसहर " का रूप ले लेते और कभी विराट रूप ले लेते हैं , पेशे  से  सहाफी  ही  लगते हैं, उनका   तथा अन्य पत्रकारों का  अपनी  त्रि -इष्ट का एक हिस्सा मानते हुए "पीछा" करने  लगा। प्रातः उनकी अभिजात्यता का शिकार हों गया , "tard ", "ard ", "moron " जैसे शब्द अपनी उपमा में मिलें।  मैंने अपने विचार में उनकी "neutrality " पर भी प्रशन दागे। तो भड़क गए। तदोपरांत मैंने बेशर्त मुआफी की गुज़ारिश की तो और भड़क गए।  मेरे मातहतो ने उन्हें "twitter " के जरिए ही उनसे उनकी निस्पक्षता पर प्रश्न पूछे  , तो खास  चाइनिस वर्ष के  नाम वाले महनुभाव और भड़के।  बच्चो ने उनकी दो दिन पुरानी भाषा दिखाई। मातहत और बच्चे भी आपको शिक्षा देते हैं , किसी  ना किसी रूप में।  एक तो  मुआफी ही नहीं चलती इस तिज़ारत भरी दुनिया में   और  पहिए ऐसे कद्रदाँ। 

हे सहाफी भाई ,वैसे ही थोड़ी इल्म तो ले  लीजिये , गुज़ारिश समझ  कर  ही। 

मानसिक अम्पयीरेज और फ्यूज की रटिंग  तो  बढ़े , ऐसी  प्रभु से  प्राथर्ना।  चम्पारण  वाला रंग  अगले अंक में उलेड दूँगा , इस बार  इज़ाजत की लिए "मुआफी"

No comments:

Post a Comment