छुटता बंधन -7
बहुतेरे रंग हमारी दलगत राजनीति के हम जैसे थोड़े पढ़े -लिखें ख़ाक़सारो कि समझ से परे है। आलावा में एक रूप जो इस चुनावी सियासत में जोर पकड़ रहा हैं उसे देख -समझ , आप भी घबरायेंगे। हैं तो यह विडंबना पहले से मौज़ूद , पर इस चुनाव में इसके जोर पकड़ने से कुछ बुनियादी सवाल फ़िर से हम छोटे मगज़ वालों को पीड़ित कर रहा है।
थोपे हुए प्रत्याशी का मसला तो हरेक चुनाव में रहा है। इस बार मथुरा , चंडीगढ़ , जौनपुर सरीखे संसदीय क्षेत्र के कुछ उम्मीदवारो के नाम पर नज़र दौड़ाइये। क्या सिर्फ हैम अध -कचरे ज्ञान वाले ही दुखी हैं। कैसा प्रतिनिधि होगा हमारा जिसने हमसे जुड़ने कि बेमानी कोशिश सिर्फ चुनाव के दो तीन महीने पहले की हो। जिसे लोगो ने सिर्फ टीवी या रुपहले परदे पर देखा हो , वो भी कुछ दुसरे नज़र से। इनकी पुरानी यादों के कैनवास पर हम जैसे थे क्या ? अगर थे भी तो दर्शाया क्यों नहीं। चलो जीतने के बाद अपने मानस-पटल पर सर्वोपर्री कर देंगे।
एक ऐसे ही महानुभाव को कल टीवी पर देखा , "यू सी ", "यू नो " इत्यादि बोलकर निपट लिए। विपक्षी प्रत्याशी का नाम पूछने पर रटा -रटाया ,बोले की मेरा सामना सिर्फ मुझसे है। चुनावी मैनजेमेंट पर "म बी ए " कि परत लगा दी । उच्च अधिकारी पदोनत्ति न मिलने पर यही समझाते है। अपने पुत्र को भी उसकी रूचि वाली विषय बेहतर करने के लिए यहीं समझाता हूँ कि आपका प्रतिद्वंद्धी सिर्फ आप हो। आप पहले से बेहतर करे तो शीर्ष पर पहुँच जायेंगे।
मगर सम्माननीय भावी प्रतिनिधि महाशय , थोपी गयी या भय से की गयी इम्प्रोवेमेंट्स टिकाऊ नहीं होती। बिन माँगे बांच रहा हुँ " वही इनोवेशन या इम्प्रूवमेंट सफल होता है जौ ज़मीनी हो तथा जिसे लागू करने वाले ही लाभान्वित हो या उस प्लान के सूत्रधार हों।
मुद्दा संसदीय क्षेत्र बदलने या चुनने का भी हैं। राजनीतिक , जातीय समीकरण आदि आदि कारणों पर थोप दिया जाता हैं या यूँ कहें उन कारणों का आड़ लिया जाता हैं। टोंक ,सवाई माधोपुर से लेकर कानपुर , लखनऊ तक मसला एक ही हैं। जम्हूरियत के सबसे निचले पायदान पर विराजने वाले हमारी छोड़िये , पार्टी कार्यकर्ता का माथा भी सटक जाता हैं। "काशी " में कुछ मजबूरी समझ में आती हैं पर वहाँ भी तौर -तरीके से हमारे जैसे घबड़ा गए हैं। जब कोई ग़ाज़ियाबाद या मुरादाबाद का पाँच साल में न हो पाया तो आपका या हमारा कैसे बन जाएगा दो महीने में।
मसले बहुत हैं ठीक उसी तरह जो नारायण ठाकुर के दिमाग में घूमते रहते थे। मोहल्ले में किसके घर में कितनी मछली बनी , पूरा तीन महीने का सटीक ब्यौरा दे देते थे। ये अलग बात थी की पट्या (तोड़ी ) मछली का जिक्र करते उनकी लार टपकने सी लगती थी। बिजई भाई और अन्य उनकी इस कमजोरी का बहुत मज़ा लेते थे पर जब भी वह मछली बनती तो नारायण ठाकुर का भाग कटोरे में पहले से निकलकर दे आते। इन दोनों का ज़िक्र मैंने पूर्व संस्करणों में भी किया हैं।
गर्मियों में नारायण ठाकुर मेहसी घूम आते। मेहसी , पूर्वी चम्पारण के दक्षिण -पूर्व भाग में पड़ता हैं। नाम तो मुजफ्फरपुर ज़िले का होता हैं पर लीचियाँ होती हैं मेहसी की । लीचियां , यही की सर्वश्रेस्ट हैं। बिकती है, दुसरे ज़िले के नाम पर है। मोतीहारी में भी लीचियों के बागान हैं पर मेहसी कि लीचियाँ अलग हैं। "शाही, त्रिकोलिआ या तुरकौलिआ , बेदाना ,पूर्वी " लीची ' ही मुझे याद है। अब तो ड्वार्फ़ , चाइनीज़ , सीडी ,लोँगिआ जैसी मशहूर और "हाई इएलडिंग" प्रजातियाँ आ गयी हैं। नारायण ठाकुर का पैतृक घर वही था । मेहसी से हरेक खेप में एक सैकड़ा लीची लाते , याद नहीं पर शायद दादी पैसे देती थी । हमारे पुश्तैनी गाँव "जो कि सारण ज़िले में पड़ता हैं" के बिजई भाई ,सदन भाई जैसे तीन-चार मोतीहारी में ही रहते थे। नारायण ठाकुर दो -तीन लीचियाँ छपरा वालों को खिलाते और उनसे अपने "पट्या ' मछली के परिहास का बदला निकाल लेते।
रघुनाथपुर की फुलवारी में "अझौली " जाति के लीची के पाँच पेड़ थे। मई महीने के मध्य में पेड़ पर चढ़कर लीचियाँ खाने की याद कैसे भुल जाऊँ। बड़े बड़े लाल चियोटे जो आम और लीची बागानों में बहुतायत में होते हैं , उन्हें खोजता हुँ इस कंक्रीट के जंगलो में जहाँ में रहता हुँ।
मेहसी के उस किशोरी के बारे में सुना होगा आपने , जिसने मेहसी में महु -उत्पादन में नए आयाम हासिल किए हैं , लीची के बागों में मधु -मक्खी पालन। वह किशोरी अब युवती हैं। सालों पहले बड़े शहर में उसकी अच्छी तालीम की पेशकश एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी ने की थी। उस लड़की ने गाँव छोड़ना ग्वारा ना समझा। समाज के साथ रहकर समाज को साथ में लेकर आगे बढ़ी वो। धन्य , संगीता ,बाबली और बबीता तेरा गुणगान करूँगा अपने पुत्रों, भाँजो और भतीजों से। उसका क्या , जो पाँच साल बाद चेहरा दिखाता हैं और फिर गाना भी गाता हैं "जीना यहाँ , मरना यहाँ ...... "

सीप से बनता पर्ल बटन ( मेहसी में , सिकरहना से मिले हुए सीप से )
No comments:
Post a Comment