Thursday, 3 April 2014

छुटता बंधन -10




                                 

                         छुटता  बंधन -10 

काफी देर विचारने के बाद सोचा इसी पर लिखुँगा , पुलिस वर्दी और उसके रुआब तथा दर्द पर स्थिरता बनी रहेगी कुछेक वर्षों या दशकों  के लिए। उन मोहतरमा का क्या जिनकी नौकरी खतरे में रहेगी। दो महीने पहले  "भेड़िया आया , भेड़िया  आया " और पेशे के सब एक हो जाओ नहीं तो हमारी स्वतंत्रता गयी का ढ़ोल इन्होंने खुब पीटा था। 

मेरी लेखनी से किसी राजनीतिक दल की भक्ति झलके तो आगाह जरूर कीजिएगा। मेरी तरफ से यकीन रखिए की ऐसा कुछ हुआ भी तो वो मेरी कमजोरी अथार्त मेरी लेखनी की त्रुटि हैं , न की कोई  राजनीतिक या वैचारिक समर्थन।  फिर भी, अनुरोध "पढ़ने वाले ,हे , सम्मानित , अगर कुछ भी राजनीतिक निस्पक्षता की आपकी परिभाषा से गलत हैं तो डपटियेगा ज़रूर"। 
लो घुम फिर कर मै उसी महिला पत्रकार पर आ गया। आऊँ ना कैसे निरर्थक प्रशन , लंबे प्रशन  तथा उत्तर के पहले ही उत्तर का पूर्वाग्रह  कर टोकने तथा दुसरा प्रशन चिल्ला  पुछने  में पेशे की अनिपुणता दिखती हैं। वैसे इस कला में कुछ और भी माहिर हैं।  पर इन्होंने तो हद कर दी। एक आकांक्षित प्रधानमंत्री को एक मशहूर  या "legendary " ख़लनायक से तुलना कर ,एक ख़ास समुदाय के लोगो से अपना उस उम्मीदवार से भय को मापना चाहती थी। अगर उस प्रोग्राम को आपने नहीं देखा हैं तो आप खुशकिस्मत है, देखना भी न चाहिए ऐसा भौड़ापन। 

कुछेक दिन पहले पढ़ा था कि  एक और संबाद से संबंधित के घर पर caretaker को कुछ भक्तजन धमकी देकर आए कि साहब को बोलना कि सोच समझ कर लिखें । उन्होंने  मुद्दा बनाया स्वतंत्रता  का , प्रतिकार किया ,अपनी लेखनी में भी जिक्र किया  ,शायद पुलिस कम्प्लेन भी किया हो पर किसी विशेष  रंग के भक्तों पर लांछन नहीं लगाया। अंतर , सोच की आपकी बुद्धिमत्ता से परे नहीं हैं। 

बिजई भाई , जो छपरा से  खास मेरे संरक्षक बनकर आए थे , छपरा  वाले गाँव से  और जिनका जिक्र  मैंने  पूर्व  संस्करणों में भी किया हैं  कमाल के पतंगबाज़ थे। उनसे मंझा बनवाने के लिए मोहल्ले के बच्चे बेचैन रहते थे।  दोपहर के समय गैराज  के पीछे  उनका कारोबार चलता था छट के आस पास और फिर मकर संक्रांति से बसंत पंचमी (सरस्वती  पुजा ) तक।  अठ्न्नी  एक रील  का लेते थे माँझा लगाने के लिए अगर रील मिला हैं तो , अन्यथा  रील मिलाकर 2 रूपैये। १६-१७ की उम्र में अपना व्यापार निपुणता भी बखुबी दिखाते , कितनों  को दो तीन टरका देते , बोलते  मुनासिब लेई नहीं बनी या फिर tubelight  का बुरादा कुछ पुराना पड़ गया था या फिर चावल के दाने थोड़े कच्चे रह गए थे।  रुआब भी दिखा देते ,कितने मेहनत का काम हैं ,उँगलियाँ कटती हैं सो अलग और कितना एहतियात बरतना पड़ता हैं।

 मैंने भी तरकीब लगाई।  नालिश की धमकी पर गुड़ के गट्टे और पाचक चूरन की अबाधित सप्लाई का मुफ्त करार उन्हें दे दिया।  अगले ही पकड़े गए दोनों और बिजई भाई को कुछ दिन मोतिहारी छोड़ना पड़ा दंड स्वरुप , मुझे  अच्छी  खासी फटकार मिली।  वाकया  मुझे पूरी याद नहीं हैं पर बिजई  भाई  हरेक  मुलाकात मेंअपने हिसाब से  याद कराकर मुझे चिढ़ाते हैं। 

दादी या जिन्हें हम "इया " समझाती थी  की हम सबसे ज्यादा गर किसी से सीखते हैं तो सोहबत से। शायद उस टीवी राजनीतिक वाद -विवाद  परिचालक पर  राजनीतिज्ञों की लंबी चुनावी सोहबत का असर होगा। 

करीब दस  साल पहले उस गैराज कि जगह मैंने कुछ दुकाने बनवा दी हैं ,  बिजई  भाई से कुछ दुनियादारी मैंने भी कम -उम्र  में सीखी थी।  हाँ , गैराज और उसके  पीछे वाली लाल अमरुद , अमड़ा, शरीफ़ा  और गुलाइची फुल  वाले पेड़।, जिन पे कुदते फाँदते मैं और शायद मेरे पिताजी भी  ,अपने मुस्टंडों को न दिखा पाउँगा।  न जाने क्यूँ इस अंक का पाठ पिताजी के लिए करने की इच्छा नहीं हो रही। 

Wednesday, 26 March 2014

छूटता बंधन-9




   

 छूटता बंधन-9 


ये ब्लॉग twitter पार सांढ़  रूप में विचरते "शोले " के खलनायक की उपाधी वाले एक महानुभाव के उसकाने से लिख पाया , उन्हीं को समर्पित। सच मानिए इनकी हास्य का मंझी यानी मुल -मंत्र  अलग हैं। आभिजात्य "मुसहर " , चाइनीस  वर्ष के आधार पर नामंकित  चूहे  और  उससे तेल निकालने  वाले से अलग।  यहाँ मसला व्यक्तिगत कम होता हैं। 



हमारी दलगत राजनीतिक प्रणाली की कुछ विडंबना सिर्फ मुझ जैसे मंद -बुद्धि  ख़ाक़सार को ही दिखे या महसूस  हो ऐसा मुमकिन नहीं हैं। आपने तवज्जो न दी हैं , ये  अलग बात हैं।हमारी राजनीति में  एक ही समुदाय तथा  क्षेत्र के नेता  एक पार्टी में तलवार और म्यान का मुहावरा चरितार्थ कर देते है। 

हमारी राजनीति का एक और नियम हैं की जिस जिने या सीढ़ी से चढ़ कर आए हो उसे गिरा दो अन्य्था प्रतिद्वंद्धी भी चढ़ेगा।  सीढ़ी के रूप में अगर राजनीतिक  गुरु भी हैं तो "गीता " याद कर वत्स , उनकी क़ुर्बानी देश के लिए निहायत जरूरी हैं। अगर  उम्र -दराज  उस्ताद हैं  तो और  उम्दा तरीके से लीला कीजिए , उनके सठियाने का स्वाँग रचाइये।


तीसरा नियम पनपने वाला हैं।  मज़ाक हैं जो कोई पनप जाए।  उचित  समय पर पर कतरने कि कला कोई हमारे राजनीतिज्ञों से सीखे।  गुजरात , हरियाणा ,पंजाब से ओड़िशा तक कितनी नुमाइशें हमने देखी हैं इस कला की। पुराने घाघ राजनीतिज्ञ एक और कला में माहिर थे , उनका विरोधी खेमे में चेला घुसाना।  यह प्रेम दो-तरफ़ा होता था , आखिर  सियासत अटकलों  और संभावनाओ का खेल हैं। मज़ेदार ये हैं कि जिस काल में इस हुनर की सबसे ज्यादा जरूरत थी यानी गठबंधन युग में ये कला विलुप्त होती जा रही हैं। इल्म  दा  और राजनीतिक विषेशज्ञ  इसे ध्रुवीकरण कहते  पर हम ख़ाक़सार इसे बदज़बानी मानते हैं।


हमारे पूर्व'प्रधानमंत्री जिनका तकिए-कलाम  "ये अच्छी बात नहीं है " शायद अंतिम राष्ट्रीय नेता थे जिन्हें इन सबो से न गुजरना पड़ा।  कॉंग्रेस में राज्य ईकाई तक ये लक्षण दीखते थे पर ऊपर अपरम्पार शक्ति के आगे तो अच्छे -अच्छो की नहीं चली। 


मेरा छोटा मग़ज़ ये बताता हैं की अगर कुछ  अप्रत्याशित न हुआ तो स्थिति विराजमान रहेंगी अपने निहित स्थान पर कुछ वर्षों के लिए।  न ,न  इसे राजनीतिक भविष्यवाणी न समझिये , मेरी औक़ात सिर्फ राजनीतिक हुनर चालु रखने में हैँ , या वंशवाद चालू रखने में हैं। "psephologist" प्रकरण देख  मुझ पर तरस खाइए।  भला ऎसी सीरत  और सीटो कि बंदरबाट ,  घड़ी -घड़ी  बदलता गणित  और दल -बदलते  समीकरण , कोई कितने जीते , मेरी बला से। 


एक निहायत मुफ्त मशवरा दे रहा हुँ ,   सीट  की संख्या predict न  कीजिएगा , गर गणित और psephology का  शौक न माने तो इल्तज़ा की  जेहन  में रखिएगा  इल्म-इ-अदद।अनयथा कुछ  भक्त आपको पड़ोसी देश भेज  देंगे या   आपको  धार्मिक  उन्मादी या उत्पाती घोषित कर देंगे। ये  भी  हो सके हैं हमारे  बच्चों  को  भ्रष्टाचारी का तमगा भी दे दे कुछ। 


"हरि  अनंत , हरि  कथा  अनंत। "


ट्विटर पर  पिछले अंक वाले आभिजात्य "मुसहर " , चाइनीस  वर्ष के आधार पर नामंकित सरीखे भयंकर  नाक -भौ वाले   "स्नॉब" महानुभाव है तो मेरी हौसला अफ़ज़ाई करने वाले भी बहुत हैं।  नाम न लुँगा , मेरे  विचारों की जड़ता हटाने  में एक नामी -गिरामी अर्थशास्त्री , पाँच  मंझे  हुए पत्रकार , कुछ हंसोड़िए ने बहुत योगदान दिया। दो उर्दूदाँ महिलाओं  का  जिक्र  भी उस्ताद के रूप में ही दूँगा। 


ख़ैर एक और बंधन मैंने तोड़ दिया।   बहुत जदोजहद  के  बाद  माँ, पिताजी और सपत्नीक  हमें  अपने नए आशियाने  वाला  वोटर परिचय पत्र प्राप्त कर  लिया।  मोतीहारी  वाला  परिचय  पत्र  अब  अमान्य हैं।  चचेरे  भाई  साहब कुछ पीड़ित हैं , मना  लुँगा।  बागडू  भाई  को  मालूम  न हैं , देखुँगा वक़्त आने पर। उनका जिक्र  छूटता बंधन-5  और    छूटता बंधन-3  में कर चुका हुँ।  न्यूनतम गालियाँ मिले उनसे , मौक़ापरस्ती  हमारी।


ये ब्लॉग twitter पार सांढ़  रूप में विचरते "शोले " के खलनायक की उपाधी वाले एक महानुभाव के उसकाने से लिख पाया , उन्हीं को समर्पित। 

छूटता बंधन-8




 छूटता बंधन-8

 दो एक दिनों से भाषा में काफी सुधार आया हैं राजनीतिज्ञों के ,  असला  तक  पहुँच  गए  कुछ  मसला नदारद हैं। तथ्य के नाम पर मिथ्या भी बखूब चला रहे हैं कुछ। मुझे यकीन और डर हिँसा और व्यक्तिगत आरोपो  का  हैं। "खुनी आत्मा ", "देश का दुशमन" आदि आदि विशेषण सुन के अगर उबकाई न आये तो निश्चित रूप से हममे  "भक्तो" और "सेनाओं " कि मानसिकता आ रही है। कैसे न होगी वितृष्णा इन अल्फाज़ो से , मुझे कोई समझाए। 
सहाफी या पत्रकार से अपना भय तथा प्रेम  छूटता बंधन-४ में ही वर्णित कर चुका हूँ।  विगत ही इनकी भाषा भी  सुनी थी एक चैनल पर।  एक अपरिपक्व प्रार्थी की तुलना दावुद इब्राहिम और आशाराम से कर डाली मेरे त्रि -ईष्ट  के एक भाग ने। अरे ख़त देख मजलूम ताड़ने वालों कुछ तो मर्यादा बनाए रखिए।  आपकी निष्पक्षता के हम खाकसार कायल हुए थे। नेताओं का चरित्र  छोड़िये , दर्शकों की तथाकथित स्व -आडम्बरित "इंटेलिजेंस " का ख्याल तो आग्रहित है। वैसे  हम ख़ाक़सारों की बुद्धिमत्ता की दुहाई आप अपने विचारों की पुष्टि के लिए बखूब इस्तेमाल करते है। 

"सोशल  मीडिया "  की  तो  बात ही निराली हैं।  "सेना " कब अपनी जश्न -ए - मोहब्बत का रुख  आपकी तरफ कर दे ,इसका  अभाश  मुझे थोडा-बहुत हो गया हैं। और ज्यादा अजीबो -गरीब हैं  "twitter"  की माया। 
लम्बी छुट्टी के दौरान किशोर पुत्र , भतीजों  और भाँजो से प्रेरित होकर मैंने  भी  डुबकी  मारी।  कुछ मातहत पहले से ही विराजमान थे। यकीन मानिए जब सुबह 8  से  शाम 8  तक  बीसेक साल ड्यूटी करने के अभ्यस्त को फ़ुर्सत मिलती हैं तो वो सब कुछ कर लेना चाहता है , अपने पुरे शौक निकलना चाहता हैं 

मुद्दत से मिली थी इस ख़ाक़सार को ये शुकून औ  फुर्सत 
जी ले ज़रा अपने लिए , ये नायाब वक़्त भी होगा रुखसत। 

अब वहाँ भी हकीम , शिक्षक कम मिले , अलबत्ता पत्रकार भरे मिले ।  एक नामी -गिरामी अर्थशास्त्र के  शिक्षक से सानिघ्य बढ़ा और मुझे अपनी अँग्रेज़ी वाली " थ्री -टियर -गवर्नेंस " पर समय बिताने कि प्रेरणा निरंतर मिलने लगी। उनसे मेरा संपर्क "ट्विटर" से ही चलता रहा। इस लघु सामाजिक-माध्यम पर खाली समय में मैं दूसरो की राजनीतिक भक्ति का परिहास  भी करने  लगा। उनकी तत्परता और "रायता फैलाने " की  अदा से दंग हो गया।  ऐसी "लॉयल्टी " का एक हिस्सा भी  अपने कंपनी में लागु कैसे करुँगा , उपाय सोचने लगा। 

एक अभिजात्य "aristocrat " जो कभी  "मुसहर " का रूप ले लेते और कभी विराट रूप ले लेते हैं , पेशे  से  सहाफी  ही  लगते हैं, उनका   तथा अन्य पत्रकारों का  अपनी  त्रि -इष्ट का एक हिस्सा मानते हुए "पीछा" करने  लगा। प्रातः उनकी अभिजात्यता का शिकार हों गया , "tard ", "ard ", "moron " जैसे शब्द अपनी उपमा में मिलें।  मैंने अपने विचार में उनकी "neutrality " पर भी प्रशन दागे। तो भड़क गए। तदोपरांत मैंने बेशर्त मुआफी की गुज़ारिश की तो और भड़क गए।  मेरे मातहतो ने उन्हें "twitter " के जरिए ही उनसे उनकी निस्पक्षता पर प्रश्न पूछे  , तो खास  चाइनिस वर्ष के  नाम वाले महनुभाव और भड़के।  बच्चो ने उनकी दो दिन पुरानी भाषा दिखाई। मातहत और बच्चे भी आपको शिक्षा देते हैं , किसी  ना किसी रूप में।  एक तो  मुआफी ही नहीं चलती इस तिज़ारत भरी दुनिया में   और  पहिए ऐसे कद्रदाँ। 

हे सहाफी भाई ,वैसे ही थोड़ी इल्म तो ले  लीजिये , गुज़ारिश समझ  कर  ही। 

मानसिक अम्पयीरेज और फ्यूज की रटिंग  तो  बढ़े , ऐसी  प्रभु से  प्राथर्ना।  चम्पारण  वाला रंग  अगले अंक में उलेड दूँगा , इस बार  इज़ाजत की लिए "मुआफी"

Saturday, 22 March 2014

छुटता बंधन -7





                             

                           छुटता बंधन -7


बहुतेरे  रंग  हमारी दलगत राजनीति के  हम जैसे थोड़े पढ़े -लिखें  ख़ाक़सारो  कि समझ से परे है। आलावा में   एक रूप जो इस चुनावी सियासत में जोर पकड़ रहा हैं उसे देख -समझ  , आप  भी घबरायेंगे। हैं तो यह विडंबना  पहले से  मौज़ूद , पर इस चुनाव में इसके जोर पकड़ने से कुछ बुनियादी सवाल फ़िर से हम छोटे मगज़ वालों को पीड़ित कर रहा है। 


 थोपे  हुए  प्रत्याशी  का  मसला तो हरेक  चुनाव में रहा है। इस बार  मथुरा , चंडीगढ़ , जौनपुर सरीखे   संसदीय  क्षेत्र  के  कुछ  उम्मीदवारो  के नाम पर  नज़र  दौड़ाइये। क्या सिर्फ हैम अध -कचरे  ज्ञान वाले ही दुखी हैं। कैसा प्रतिनिधि होगा हमारा जिसने हमसे  जुड़ने कि बेमानी कोशिश सिर्फ चुनाव के दो तीन महीने पहले की हो। जिसे  लोगो  ने  सिर्फ  टीवी या रुपहले परदे   पर  देखा हो  , वो  भी  कुछ  दुसरे  नज़र से। इनकी  पुरानी  यादों  के कैनवास  पर हम जैसे थे क्या ? अगर थे भी  तो  दर्शाया  क्यों  नहीं।  चलो  जीतने के  बाद  अपने  मानस-पटल पर  सर्वोपर्री कर देंगे। 


 एक ऐसे ही  महानुभाव  को कल टीवी पर देखा , "यू सी ", "यू नो " इत्यादि  बोलकर  निपट लिए। विपक्षी  प्रत्याशी  का नाम पूछने  पर   रटा -रटाया ,बोले  की  मेरा  सामना  सिर्फ  मुझसे है। चुनावी मैनजेमेंट  पर  "म बी ए " कि परत लगा दी । उच्च अधिकारी पदोनत्ति न मिलने पर यही समझाते है। अपने पुत्र को  भी उसकी रूचि वाली विषय  बेहतर करने के लिए यहीं  समझाता  हूँ  कि  आपका प्रतिद्वंद्धी  सिर्फ आप हो। आप  पहले  से बेहतर करे  तो शीर्ष पर पहुँच जायेंगे। 


 मगर सम्माननीय भावी प्रतिनिधि  महाशय  , थोपी गयी या भय से की गयी इम्प्रोवेमेंट्स टिकाऊ नहीं होती। बिन माँगे  बांच रहा हुँ " वही इनोवेशन या इम्प्रूवमेंट सफल होता है जौ ज़मीनी हो तथा  जिसे लागू करने वाले ही लाभान्वित हो या उस प्लान  के सूत्रधार हों।  

मुद्दा  संसदीय क्षेत्र बदलने या चुनने का भी   हैं। राजनीतिक  , जातीय  समीकरण आदि आदि कारणों पर थोप दिया जाता हैं  या यूँ कहें उन कारणों का आड़ लिया जाता हैं। टोंक ,सवाई माधोपुर से लेकर कानपुर , लखनऊ तक मसला एक ही हैं। जम्हूरियत के सबसे निचले पायदान पर विराजने वाले हमारी छोड़िये , पार्टी कार्यकर्ता का माथा भी सटक जाता हैं। "काशी " में कुछ मजबूरी समझ में आती हैं पर वहाँ भी तौर -तरीके  से हमारे जैसे घबड़ा गए  हैं।  जब कोई  ग़ाज़ियाबाद या मुरादाबाद का  पाँच साल में न हो पाया तो आपका या हमारा कैसे बन जाएगा  दो महीने में। 

 मसले बहुत हैं ठीक उसी तरह जो नारायण ठाकुर के दिमाग में घूमते रहते  थे।  मोहल्ले  में किसके घर में कितनी मछली बनी , पूरा तीन महीने का  सटीक ब्यौरा दे देते थे।  ये अलग बात थी की पट्या (तोड़ी ) मछली का जिक्र करते उनकी लार टपकने सी लगती थी।  बिजई भाई और अन्य उनकी इस कमजोरी का बहुत मज़ा लेते थे पर जब  भी वह  मछली  बनती  तो  नारायण ठाकुर का   भाग  कटोरे में पहले से निकलकर दे आते। इन  दोनों  का ज़िक्र मैंने  पूर्व संस्करणों में भी किया हैं। 


गर्मियों  में नारायण ठाकुर  मेहसी घूम आते। मेहसी  , पूर्वी  चम्पारण के  दक्षिण -पूर्व भाग में पड़ता हैं।  नाम तो  मुजफ्फरपुर ज़िले का होता हैं पर लीचियाँ होती हैं  मेहसी की ।  लीचियां  , यही की सर्वश्रेस्ट  हैं।  बिकती है, दुसरे  ज़िले  के नाम पर है। मोतीहारी में भी लीचियों  के  बागान  हैं  पर  मेहसी कि लीचियाँ अलग हैं। "शाही, त्रिकोलिआ या तुरकौलिआ , बेदाना ,पूर्वी "  लीची ' ही मुझे याद है।  अब तो ड्वार्फ़ , चाइनीज़  , सीडी ,लोँगिआ  जैसी  मशहूर और "हाई इएलडिंग" प्रजातियाँ  आ गयी हैं। नारायण ठाकुर का पैतृक  घर वही था ।  मेहसी से हरेक खेप  में  एक  सैकड़ा लीची लाते , याद नहीं पर शायद  दादी पैसे  देती थी । हमारे पुश्तैनी गाँव "जो कि सारण ज़िले में पड़ता हैं"  के बिजई भाई ,सदन भाई जैसे तीन-चार  मोतीहारी में ही रहते थे। नारायण  ठाकुर  दो -तीन लीचियाँ  छपरा वालों को खिलाते और उनसे अपने "पट्या ' मछली के   परिहास का बदला निकाल लेते।  

रघुनाथपुर  की  फुलवारी में  "अझौली " जाति के  लीची के पाँच पेड़ थे। मई महीने के मध्य में पेड़ पर चढ़कर  लीचियाँ खाने की याद  कैसे भुल जाऊँ।  बड़े बड़े लाल  चियोटे जो आम और लीची बागानों में बहुतायत  में होते हैं , उन्हें खोजता हुँ इस कंक्रीट के जंगलो में जहाँ में रहता हुँ। 


 मेहसी के उस  किशोरी के बारे में सुना होगा आपने ,  जिसने  मेहसी में महु -उत्पादन  में नए आयाम हासिल किए हैं , लीची के बागों में मधु -मक्खी पालन। वह किशोरी अब  युवती हैं। सालों पहले बड़े   शहर   में  उसकी अच्छी  तालीम की पेशकश  एक बहुराष्ट्रीय  कम्पनी ने की थी।  उस लड़की ने गाँव छोड़ना ग्वारा ना समझा। समाज के साथ रहकर समाज को साथ में लेकर आगे बढ़ी  वो। धन्य ,  संगीता ,बाबली  और बबीता  तेरा गुणगान करूँगा अपने पुत्रों, भाँजो और  भतीजों से।  उसका क्या , जो पाँच साल बाद चेहरा दिखाता हैं और फिर गाना भी गाता हैं "जीना यहाँ , मरना यहाँ ...... "






सीप से बनता पर्ल   बटन ( मेहसी में , सिकरहना  से मिले हुए सीप से )


Wednesday, 12 March 2014

छुटता बंधन -6

                           
                               


                                                           

                                          

                                 छुटता बंधन -6

एक दो दिन पहले सोशल मीडिया पर एक राजनीतिक दल के भक्तों को पाप -पुण्य का प्रयोग बहुतायत में करते  देखा , समझ ना पाया। चैनेल -सर्फिंग कि तो मसला कुछ पल्ले पड़ा। यकीन मानिये ,मुस्कुराहट  भी ना आई ,कटाक्षों पर। एक टीवी चैनल  तो  बजाप्ता फुटेज दिखा चटखारें ले रहा था , वैसे उस चैनल ने सारी नैतिकता की चादर ओढ़ ली थी। बाकी पत्रकारों  को एक इंच भी न दिया था ढकने के लिए । राजनीति में गणन की कला तो  मजबूरी हैं लगता हैं की पत्रकारिता में इस कला ने पैठ कर लिया हैं।

       तिजारत ही क़ाबिल -ए -ेअते माद की तरक़ीब , हैं  उनका फ़साना :
       इल्म -उल -अदद  कब बनी इंसान की तसदीक़ , खाकसार भी जाना।
( तिजारत - व्यापार ,ेअते  माद - विस्वास ,इल्म-उल-अदद -- गणन की कला ;तसदीक़ --इमान )

सीधे पुण्य के बारे में ज्यादा कुछ लिखना खुद से बेमानी और बेईमानी होगी ,इसीलिए पाप के बाद वाले पुण्य के बारे में ही लिखुँगा। 

अजीब-गरीब सा रिश्ता तुने मुझसे बना लिया। सर पर मातृ वृत तु उसी दिन बैठ गयी ,जिस दिन ब्रोदर जोस ने स्कूल में विवरण में तेरा नाम जोड़ दिया। मैंने प्रतिवाद किया तो वो थोड़ा अचंभित हुए पर तेरी महिमा के आगे मेरी ना चली , ब्रोदर जोस तो फिरंगी थे ,उन्हें हमारे रिश्ते का क्या इल्म। आज समझ में आता है कि सदन ,बिजई भाई ,उगम भाई और नारायण ठाकुर सरीखे कम पढ़े या अनपढ़  लोग क्यूँ तुझसे घबराते थे। व्यवहारिक ज्ञान में निपुण ये मेरे सरल प्रिय -जन बखूब तेरे पापों को भाँप गए थे। तुझे सुनते ही बड़बड़ाने लगते "ढेर काबिलियत " बड़बड़ाने लगते। उनकी  अस्मिता खतरे में दिखती होगी उन्हें ,तेरे प्रचार प्रशार से। दुनियादारी में निश्चय ये ज्यादा ज्ञानी हैं। 

प्रवाशी हुँ , अगर मेरे क्षेत्र का कोई कम पढ़ा  दिखता हैं तो आत्म -भाव से तेरे बहन या अपनी  मातृ -भाषा  का प्रयोग करने की कोशिश में ज्यादातर नाकामी मिलती।  शायद , उन्हें  अपना  बारंबार  आत्मीयिता के नाम पर ठगना याद आता होगा। फायदा उठाने वाला शोषक से कोई अपनी  मज़बूरी बयाँ करता है क्या ? तुझे क्या फर्क पड़ता हैं , तेरे कद्रदानो में तो इजाफा हो रहा है। 

निष्ठुर है तु।  पहले  मेरे बाबा -दादी  के प्रयोग वाली "कैथी" लिपि को खा लिया।  अब मेरे मातृ -भाषा  के  पीछे लगी है। क्या  चरित्र है तेरा , तूने अपनी सबसे नज़दीकी बहिन  को भी न बक्शा है।  इल्म कि भाषा को बेआबरू तु ही कर रही है। साम्यवाद के जोश में रूस में सब उपनामों के पीछे "ओव " "इव " या "इच " लगाना मज़बूरी थी ,वैसा ही तेरा रूप मुझे दिख रहा है। बिहार -यु पी  के कुछ क्षेत्रीय भाषाओं और लिपियों की भक्षा तूने कर ली है ,अपने आराधय जननी की दुर्दशा की जिम्मेदार  तु  ही दिखती हैं मुझे। 

हम  जैसे खाकसार तो सोचते है  या तो अपनी मातृ -भाषा  में  या  फिर  एक विदेशी में  ,तुझमे तो  कदापि नहीं।मेरे जैसे  माणुस  जज़बात या उत्तेजना में या अपनी मातृ -भाषा अन्यथा उसी विदेशी भाषा का प्रयोग करते है। तूने  ऐसा शमां बांधा की  मूल तो पीछे छुट गया।  हाँ , तुझे निजाद ना मिली। अब नयी पीढ़ी उस विदेशी मेम को तरजीह दे रही हैं। 

नारायण ठाकुर घर के हज्जाम थे।  हाते  में गैराज के पीछे सपरिवार रहते थे।  लकड़ी का एक बक्शे में छुरा , टिकिया ,डेटॉल  वाला  पानी , ऐनक  रखकर अपना व्यवसाय चलाते थे। पंचमंदिर से लेकर ज्ञान बाबू चौक तक , हेनरी  बाज़ार और गुदड़ी  बाज़ार उनका इलाका था। सब खबर रहती थी , कहाँ किसने ज़मीन के लिया कितना बयाना दिया हैं ,किसके रिश्ते कि बात कहाँ चल रही है, किसके घर में नमक  कम पड़ता है अदि-अदि। सुबह चाचा कि हज़ज़ामत बना कर निकल जाते। सालाना पैसे , धान , सरसो और जरूरत अनुसार उनका बनता था और वह बखूब उसळते भी थे। मोहल्ले के किशोरों को खैनी की आदत लगवाते और फिर आभाव का पिटारा खोल उन सबो से सुबह -सुबह  एकाध रुप्पिया वसूलते। पहली दाढ़ी बनाने के समय माँ -पिताजी दोनों से अलग नया छुरा औऱ गमछा का पैसा' वसुल लिए रहे , रश्म के पैसे अलग से। मेरी पहली पगार से साफा ,कुरता ,पयजमानुमा पैंट , चमड़े'कि चप्पल , गमछा ,गंजी इत्यादि  उन्होनो और बिजई भाई ने लिया था। बाद में पता चला कि पंचमंदिर के पास बैठे  भिखारियों को उन दोनों ने दिन में खाना खिलया था 
 और पूजा-अर्चना भी कि थी

नारायण ठाकुर की हरेक  शाम ताड़ वृक्ष के उत्पाद  के सानिघ्य बीतती।  बड़ा हुआ तो बघारते थे कि चौदह की उम्र से फ़लक़ -नुमा दरख़्त का रिसाव  का सेवन हरेक दिन किया है पर कभी अपने पैसो से नहीं। होली के दिन विलायती ही छूते थे।होली के दिन  खाना  खाने के बाद हम भाई -बहन  गोल वाली चबूतरे पर बैठ जाते ,नारायण ठाकुर भी हाजिर हो जाते और हमें अपने अंदाज़ में अँग्रेज़ी में बकबकाते।  "सौदागर " में दिलीप कुमार एक  जगह वैसे ही बोलते दिखाय गय है। फिर  उठकर  घर  के चौके  में  बाकियों  के साथ भोजन को जाते।

खैर , तू जैसी भी है छल -रुपी , मेर पूज्य ही है।  तेरे पाप तो मैंने  गिना दिए , तेरे पुण्य गिनने वाले मुझसे हुनरदा  और क़ाबिल है।  संस्कृति और माँ -बाप कि दी सीख से  तेरा क्या किसी भाषा का निरादर नहीं कर सकता।



इस  ब्लॉग  का  सूत्र  मेरा  खुद का न है। एक महानुभाव के लेखनी  ने मुझे और मेरे विचारो को  झकझोरा था। " हिंदी  कि आधुनिकता " http://naisadak.blogspot.in/2014/02/blog-post_6024.html




Sunday, 9 March 2014

छुटता बंधन -5





                           छुटता बंधन -5


कार्य व्यस्तता के कारण कम लिख पाता हुँ , उससे  भी कम हिंदी में लिख पता हुँ।अँग्रेज़ी में भी थोड़ा  लिख लेता हुँ, मिशन स्कूल में पढ़ने के कारण से भाषा में  विचारणे की शक्ति बदलती है या नहीं , इस  बहस पर बेबाक बहस भी कर सकता हुँ।   मनोदोष कह लीजिए या फिर अनुचित स्वालोकन , जानता हुँ कि हिंदी में बुरा तो बिलकुल नहीं लिखता, हाँ भाषा की त्रुटिया और पद अशुद्धियां मानने में मुझे कोई संकोच नहीं । कुछ तो सॉफ्टवेयर  एप्लीकेशन  का कमाल हैं  और कुछ मेरे ज्ञान का। अँग्रेज़ी के जानकर मेरी लेखनी में "िनकहेरेन्स " को एक मुद्दा बताते है , "वैचारिक उतेजना' कह सकते है , अन्य्था  चलाऊ बोलते हैं।  पेशे से लेखक नहीं
हुँ न ही ये भ्रम है कि मुझमें वैसी  क़ाबलियत है। 


 हिंदी और क्षेत्रीय भाषा में लिखने वाले , उपेक्षा का रोना हर वक़्त रोते हैं।आग्रह उनसे ये कि  "आइना भी झाँक ले " पर सुनेगा  का कौन ? हिंदी का तथाकथित सिमटा सा अभिजात्य वर्ग के लिए संकुचित का प्रयोग कर के बदज़बानी नहीं कर सकता। हम जैसे शौकिया लिखने वाले के उनकी रचनाए  पढ़ लेना खुशकिस्मती ही समझिए , हाँ , भाई हमारे लिए हीं। आराध्यों को दोष देना हमारी संस्कृति की परम्परा के विपरीत है , खासकर जब मसला  हिंदी और क्षेत्रीय भाषा के लेखकों का हो। कुछ दोष तो परस्तिथिया भी उजागर कर देती हैं।  संचार तकनीक का इस्तेमाल करते हुए मैंने गिने चुने प्रतिष्ठित हिंदी लेखको को हीं देखा हैं। अगर मेरी ये धारणा गलत निकली तो सच मानिये कुछ शुकून सा मिलेगा। स्कूली साहित्य में कही पढ़ा था कि लेखक समाज और पाठकों की  मानसिकता से ज्यादा ऊपर जा ही नहीं सकता। न जाने क्यूं लगता है कि यह  मेरी  सच या मिथक ज्यादा  हैं।  परंतु जब अँग्रेजी के लेखकों को देखता हुँ तब पुनर्विश्वास हो जाता हैं की "जी बी सॉ " ने अतिश्योक्ति नहीं कि थी। 
फासला मंज़िल का बढे तो उतना दर्द नहीं होता जितना काफ़िले में परस्पर फासलों से होता हैं। 

हिंदी पत्रकार  गण और परिचालक गण काफी मात्रा मे सोशल मीडिया का  प्रयोग करते हैं। इस दौरान कुछ ने हिंदी व्यव्हार की कोशिश भी की हैं। ऐसे ही द्वय की प्रेरणा लेकर हिंदी में कुछेक दिनों से लिखना चालु किया था। अब इस  समुह की साहित्य में स्तिथि बहुत ही महत्वपूर्ण पर जटिल सी लगती है ,हम ख़ाक़सारो को। ये तो मानना पड़ेगा कि इनका संवाद दर्शको से काफी हैं।  कुछ माध्यम की मज़बूरी और  कुछ इनकी अपनी अभिलाषा , पाठक या दर्शक के साथ इनका संपर्क जारी है बदस्तूर।  पर बात इतनी सरल होती तो कोई मुद्दा ही न था। भाषा की दुर्दशा पर ये भी चिल्लाते हैं।  कुछ मज़बूरियाँ इनके साथ भी  है।  राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी पत्रिकाएं की लोकप्रियता तो विदित है , राष्ट्रीय हिंदी अखबारो ने क्षेत्रीयता का सहारा पकड़ रखा हैं। एक दो राष्ट्रीय हिंदी टीवी चैनलो को छोड़ ,बाकी के निस्पक्षता  और  वस्तु -विशेष पर  विश्वस्तता  किसी एक  चौराहे पर दिन भर खड़े होने से  पता चल जाता है, ऊपर से क्षेत्रीय टीवी चैनलो का विस्तार।  
 ये हमारे भावनावो के नुमाईन्दे  सिर्फ खबरों दिखाकर या हमारी राजनीति की हिंसक असहमति और वैचारिक  खोखलापन दिखाकर बच निकलते है। इनका  योगदान भाषा  के प्रति क्या हों , जो इनकी भी चलती रहे और भाषा का प्रशार भी निरंतर हों। प्रार्थना , महानुभवों  कि एक और माध्यम बनिए हिंदी के साहित्यकारों और पाठको के बीच। पहुँच तो कोई समस्या ही नहीं हैं , हम  ख़ाक़सारो   को इसमें अवसर दीखता  है। भाषा प्रचार के एक स्तम्भ है आप अब माध्यम बन जाइये।  पाठक गण को अपनी अभिव्यक्ति का सुयोग दीजिये, बाछियें , छांटिए  कुछेक को प्रेरित कीजिये , आलोचना, विश्लेषण,प्रोत्साहन जैसे भी। एक को चुनकर कुछ दिनों तक उसे भाषा और अभिव्यक्ति  की बारीकियों की तरफ प्रेरित कीजिये। ये पद्धति  निरंतर चले , कुछ समय  तो गुज़ारिए अपनी  भाषा के लिए। 
 ये फ़क़त एक मशवरा हैं , आपकी   बुद्धिमत्ता और भाषा कि उन्नति की ईक्षा  मुझ जैसों से तो  लाख गुनी ज्यादा  हैं। तात्पर्य ये कि भाषा प्रयोग, विकास तथा माध्य की और अग्रसर होइए। समाज में विचारो कि इस देश में कमी कब थी , सटीक  व्यक्त करने का जरिया कौन होगा ?

पाठकों और दर्शकों के  रवैये पर आप से बेहतर कौन लिखेगा।  व्यंगय-हास्य ज्यादा न लिखियेगा और हलके में लिखिएगा । चुनावी माहौल है , बहुतों कि नज़र रहती हैं।  "पक्षपाती , पैड मीडिया , LIO,   :-),D,P,LIQ"आदि -आदि  कि उपाधि तो हम श्रोता गण ,दर्शक गण दे न दे, गण जरूर देते हैं  ।  राजनीति के   भक्तो के समझ कि दाद देता हूँ।  आलु को बैगन से , फिर बैगन को टिंडे से ,और न जाने कहाँ तक रायता फैलाते है। अब तो केन्या कि "उगाळी " या  मोर्रोको के"बिस्तीयाँ सरीखे   पकवान भी सूँघा देते हैं ट्विटर पर पत्रकारों को। 


तीसेक वर्षो  से समाचार देखता और पढता हुँ , अँग्रेज़ी  में ही पढ़ा और देखा। जीवन के उत्तरार्द्ध में पहुँचा तो लगा की पुरानी पहचान न टूटनी चाहिए चाहे आप बहुत सारी नयी बना लो तो भी। मेरे सबसे बड़े वैचारिक आलोचक , मेरे पिता और चचेरे भाई मेरा यह नयी मोहब्बत देख मंद -मंद मुस्कुराते है। किशोर बालक द्वय  चिढ़ते है तो समय और टीवी का बॅटवारा कर लिया हुँ , हाँ पर इन्हें वो गलती न करने दूँगा ,जो मैंने की थी। सुखद आश्चार्य की एक उत्पाती ,मेरी तरह एक परिचालक को पसंद कर रहा हैं।  शायद एक ही तालुका के होने से उसे मेरे और पिताजी कि भाषा शैली का पुट उस परिचालक में भी दीखता हैं। "गीता" और "एथिकल मैनेजमेंट" का "माध्यम सर्वोप्परी - मंज़िल स्वतः " वाला सिद्धांत जान बूझ कर भूल जाते है हम तीन पीढ़ी। "सेंटीमेंटल फ़ूल " तो हमें  ही कहते हैं , ये बड़े बड़े राजनीतिज्ञ और प्रशाशनिक चिंतक। 

अंत में "बगडू  भाई" जिनका जिक्र मैंने छूटता बंधन -३  में किया था सिर्फ एक बार ही मोतिहारी से बेतिया गए। सौतेली माँ के इंतेकाल पर।  बाप दादाओं का जो कुछ था , सौतेले भाइयो पर छोड़ दिया।  कोई निशानी भी न माँगी अपनी विरासत को याद करने के लिए। मेरे चचेरे भाई उन्हें अपनी गाड़ी में लें गए थे।  लौटते वक़्त पुछा कि भाई ,एक कुर्सी या दराज वाली मेज ही माँग लेते ,विरासत की निशानी मानकर तो चिर-परिचित मुद्रा  में भकुटी तान ली। कुर्ते से डायरी निकाली और कलम भी और लिखा 
" रामयण लिखले मन का टूटल गोसाई 
  बगडू के है अभी जिन्दा दो हट्टे भाई "
इया के जाने के बाद  उनकी "कैथी लिप्पी" वाली डायरी हमने बगडू भाई के पुजा वाले कमरे में रखा देखा है। चाचा के गुजरने पर  उनकी  पुरानी रेलवे टाइम टेबल ,जिसमें चाचा करीबन सौ कोर्रेक्शंस कर चुके थे वो भी बगडू भाई ने हथिया ली हैं। 

Thursday, 6 March 2014

छुटता बंधन -४

     
                                    छुटता  बंधन -४ 

पत्रकारिता और राजनीति की दूरियाँ तो पहले से ही कम रहीं है। पूरक ही कह सकते हैं एक दुसरे के। खबर कहाँ बनती हैं राजनीति के बगैर और राजनीति की पहुँच कहाँ पत्रकारिता के बगैर। सार्थक  राजनीति  में कई पत्रकारों ने बहुत मुल्यवान भुमिका निभाई हैं। क्षेत्रीय भाषा तथा हिंदी के पत्रकार इनमें ज्यादा संख्या में नज़र आते हैं।  हाँलाकि ये भी स्पष्ट विदित हैं की कितनों ने दोनों के साथ सामंजस्य सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए ही किया हैं। वर्तमान  राज्य सभा में अनेको ऐसे बाद वाले उदाहरण प्रतीत होते है। अजीबो ग़रीब रिश्ता हैं पत्रकारिता और राजनीति का, कभी ३६ का आँकड़ा कभी ६३ सा मेल। राहुल देव, रवीश कुमार , एस के  सिंह , भूपेंद्र  चौबे, अभय दुबे  या दिबांग जैसे हिंदी पत्रकारिता के दिग्गज  बक या लिख ले तो भी इन दोनों के रिश्ते के कुछ पहलु उज़ागर  बच ही जाएंगे।  

हाल फिलहाल में हिंदी टीवी से जुड़े परिचालक का एक राजनीतिक दल में शामिल होना काफी सुर्खियों में रहा है। नैतिकता के सवाल उठे है। हास्य -परिहास , व्यंग्य आदि-आदि के पात्र बन गए है ,महाशय। उनके साथ   दसेक साल पहले वाले  वाली एक राजनीतिक मान्यवर की बदतमीज़ी का भौड़ा फुटेज भी दिखाया गया।  

पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों पर बोलने की ना समझ हैं और ना ही औक़ात है,इस पेशे से अपना  फासला खानदानी हैं।  हाँ ,अंतराल  "उनकी इस्तीफे और राजनीति में उतरने का" अट्पटा सा लगा। कुछ ठगा हुआ सा महशूस तो हम ख़ाक़सारो ने किया। उनकी  साहस की दाद  तो देनी पड़ेगी। इरादा तो अभी तक नेक ही दीखता है , विवादित हैं तो उनकी बड़बोली , तौर तरीका , कवरेज की अतृप्त इक्षा और अँग्रेज़ी की स्पेलिंग। 

'फुफु दादी'  हमेशा  समझाती थी की तीन  की इज्जत कभी ना छोड़ना " हकीम , उस्ताद और सहाफ़ी " का , हो सकें तो  इन तीनों की सोहबत बनाए रखना। समझ बहुत देर से आइ  उनकी ये सीख। 

पंचमंदिर -ज्ञान बाबु चौक  रोड के  रास्ते में गुदड़ी बाज़ार से होकर मेन रोड को  जोड़ती हुई एक सड़क है , बगल से ही एक रास्ता हेनरी  बाज़ार को जाता है। आमने  सामने दो अहातों के बीच की सड़क क्या थी मेरे लिए। बीसियों बार अपने घर से निकल कर उनके घर पहुँच जाता था। पिताजी तो उन्हें "ममानी" कहते थे पर मै उन्हें "फुफु दादी " ही बुलाता था, उनके  भतीजों ने सीखा दिया था। निसंतान थी ,दो सौतेले पुत्र  थे  एक  हाई कोर्ट में जज, दुसरे कुलपति थे एक विश्व- विद्यालय में बाद में राजनीति में घुसे और शिक्षा मंत्री भी रहें। दोनों बेटों का आना जाना काफी कम था। अफरात ज़मीन -जायदाद थी ,उन्होंने अपने दो भाईयों  और एक बहन को अपने पास ही बुला लिया था। बहन -बहनोई को हाते में ही एक मकान दे रखा था, भाई दोनों उन्हीं के साथ रहते थे। बड़े वाले ने शादी न की थी और छोटे वाले के आठ बच्चे थे। आठों मुझसे बड़े थे और उन्हें फुफु बुलाते थे , मैंने और चचेरे भाई बहनो ने " फुफु  दादी " ऐसे  ही न  पकड़ा  था। हम भोजपुरियो को तो उनकी कम्बख्त, कम अक्कल  वाली गालियाँ भी आशीर्वाद जैसी लगती ऊपर से उनका हमारे लिए दुलार। 

इया उनके खाविंद को राखी बाँधती थी। इया बताती थी की बाबा और उनके मुँहबोले भाई में अजीब प्रतिस्पर्धा थी  , पेशेवर  जलन  बताती थी। राखी , भाई-दूज  और  तीज  कभी  न  भूलते  थे  "खान बहादुर।" दादी के अपने मैके  से आये न आये  इस भाई  से सौगात ज़रूर आती थी , कुछ  खुद भी उठाकर लाते   थे "खान बहादुर' ऱश निभाने के लिए।  मुझे नेपथ्य में  अपने बाबा  के होठो  कि मुस्कान दिख जाती थी  मानो ये बता रहे की वक़ालत  चलती तुम्हारी ज्यादा हैं पर "राय बहादुर ' की शहर में इज्जत ज्यादा हैं। 

फुफु अम्मा नब्बे को पार  करने के  बाद  गुज़री। पिताजी के राय मशवरा के बिना कोई बड़ा फ़ैसला न लेती थी। माँ को खबर लेती रहती की कब उनका भांजा आयेगा।  पिताजी जब  भी घर  आते  तो घण्टे भर के भीतर अपनी ममानी  के सामने हाजिर- नजीर हो जाते। मुझे कभी उन्होंने मेरे नाम  से न   बुलाया , "सुरेन्दर का बेटा " कहती थी। बचपन में उनके ऐसा कहने पर आँख तरेड़  देता था  तो मुस्कुरा उठती , फिर थोड़े देर बाद बोलती "अरे , रूबी देख तो हरे चने का हलवा बचा है गर तो खिला सुरेन्दर के बेटे को , उसे बहुत पसंद है। "
शब ए बरात में तरह तरह के हलवे खुद अपनी हाथ से बनाकर खिलाती। अब भी कभी -कभार चने  का हलवा मिल जाता है खाने को "फुफु  दादी" का खुबशुरत  मुखड़ा और उनकी इन्तहा कशिश वाली आँखों का क्या। 


मेरे उर्दू न  पढ़ पाने की एक वजह वो थी। खानदान कि एक परंपरा को अनजाने में तोडा मैंने। मलाल जीवन भर रहेगा , न न परंपरा तोड़ने का नही अपितु अपने उर्दु न सिख पाने का।  इया ने घर पे अँग्रेजी और गणित के दो  मास्टरों की सरपरस्ती लगवा दी थी।  उर्दू  के लिए मिस्कौट के पास मौलवी साहेब के मदरसे में ग्यारह बजे बिजई  भाई छोड़ आते थे। घंटे की अलिफ ,बे ,पे,ते , एक और ते ,से ,जिम,चे ,हे  याद करने के लिए , उदंडता में घिनौनी शरारत की तो अरशद मौलवी साहेब ने जबरदस्त मज़म्मत और मरम्मत कर डाली। बिजई भाई जब लेने आये तो मौलवी साहेब से भीड़ गए , "एंह , ज्यादा फारसी मत बकबकाइए , बउआ पे हाथ कैसे उठाए " और फिर भोजपुरी चालू हो गए। ऊपर  पहले मंज़िल से "फुफु  दादी" ने मुझे सिसकिया लेते हुए लौटते देखा, इशारा किया और  दरबान के सामने बिजई भाई कि भी न चली। पूरी कहानी तो नमक मीढ़ हल्दी लगाकर बिजई भाई ने मेरा दोष छिपाते हुए एक ही साँस में बखा दिया। फुपु दादी ने बुर्क़ा ओढ़ा और पहूँच  गयी इया के पास , 'न ,नहीं पढ़ेगा मेरा बच्चा ,किसकी मज़ाल हो जो मेरे बच्चे को हाथ लगा दे। किसने भेजा था इसे उस जल्लाद के पास। जाहिल जिससे गुल  कि  परवाह नहीं ,वो क्या  बाग़ लगयेगा , अहमक़ , नामुराद ...." कुछ उर्दू अल्फाज़ तो मैंने वहीं सीख लिए। एक और बात जो मुझे याद है  कि उन्होंने मेरा जिक्र मेरे नाम से ही किया। 

चलिए भाई सहाफ़ी  पुज्य, प्रशन  पूछते रहिए , उत्तर  मिले या गालियाँ , निर्भीक होकर , निस्पक्ष होकर बस थोड़ा मुस्कुराकर और हमारी भी थोड़ी सुनकर