छुटता बंधन -10
काफी देर विचारने के बाद सोचा इसी पर लिखुँगा , पुलिस वर्दी और उसके रुआब तथा दर्द पर स्थिरता बनी रहेगी कुछेक वर्षों या दशकों के लिए। उन मोहतरमा का क्या जिनकी नौकरी खतरे में रहेगी। दो महीने पहले "भेड़िया आया , भेड़िया आया " और पेशे के सब एक हो जाओ नहीं तो हमारी स्वतंत्रता गयी का ढ़ोल इन्होंने खुब पीटा था।
मेरी लेखनी से किसी राजनीतिक दल की भक्ति झलके तो आगाह जरूर कीजिएगा। मेरी तरफ से यकीन रखिए की ऐसा कुछ हुआ भी तो वो मेरी कमजोरी अथार्त मेरी लेखनी की त्रुटि हैं , न की कोई राजनीतिक या वैचारिक समर्थन। फिर भी, अनुरोध "पढ़ने वाले ,हे , सम्मानित , अगर कुछ भी राजनीतिक निस्पक्षता की आपकी परिभाषा से गलत हैं तो डपटियेगा ज़रूर"।
लो घुम फिर कर मै उसी महिला पत्रकार पर आ गया। आऊँ ना कैसे निरर्थक प्रशन , लंबे प्रशन तथा उत्तर के पहले ही उत्तर का पूर्वाग्रह कर टोकने तथा दुसरा प्रशन चिल्ला पुछने में पेशे की अनिपुणता दिखती हैं। वैसे इस कला में कुछ और भी माहिर हैं। पर इन्होंने तो हद कर दी। एक आकांक्षित प्रधानमंत्री को एक मशहूर या "legendary " ख़लनायक से तुलना कर ,एक ख़ास समुदाय के लोगो से अपना उस उम्मीदवार से भय को मापना चाहती थी। अगर उस प्रोग्राम को आपने नहीं देखा हैं तो आप खुशकिस्मत है, देखना भी न चाहिए ऐसा भौड़ापन।
कुछेक दिन पहले पढ़ा था कि एक और संबाद से संबंधित के घर पर caretaker को कुछ भक्तजन धमकी देकर आए कि साहब को बोलना कि सोच समझ कर लिखें । उन्होंने मुद्दा बनाया स्वतंत्रता का , प्रतिकार किया ,अपनी लेखनी में भी जिक्र किया ,शायद पुलिस कम्प्लेन भी किया हो पर किसी विशेष रंग के भक्तों पर लांछन नहीं लगाया। अंतर , सोच की आपकी बुद्धिमत्ता से परे नहीं हैं।
बिजई भाई , जो छपरा से खास मेरे संरक्षक बनकर आए थे , छपरा वाले गाँव से और जिनका जिक्र मैंने पूर्व संस्करणों में भी किया हैं कमाल के पतंगबाज़ थे। उनसे मंझा बनवाने के लिए मोहल्ले के बच्चे बेचैन रहते थे। दोपहर के समय गैराज के पीछे उनका कारोबार चलता था छट के आस पास और फिर मकर संक्रांति से बसंत पंचमी (सरस्वती पुजा ) तक। अठ्न्नी एक रील का लेते थे माँझा लगाने के लिए अगर रील मिला हैं तो , अन्यथा रील मिलाकर 2 रूपैये। १६-१७ की उम्र में अपना व्यापार निपुणता भी बखुबी दिखाते , कितनों को दो तीन टरका देते , बोलते मुनासिब लेई नहीं बनी या फिर tubelight का बुरादा कुछ पुराना पड़ गया था या फिर चावल के दाने थोड़े कच्चे रह गए थे। रुआब भी दिखा देते ,कितने मेहनत का काम हैं ,उँगलियाँ कटती हैं सो अलग और कितना एहतियात बरतना पड़ता हैं।
मैंने भी तरकीब लगाई। नालिश की धमकी पर गुड़ के गट्टे और पाचक चूरन की अबाधित सप्लाई का मुफ्त करार उन्हें दे दिया। अगले ही पकड़े गए दोनों और बिजई भाई को कुछ दिन मोतिहारी छोड़ना पड़ा दंड स्वरुप , मुझे अच्छी खासी फटकार मिली। वाकया मुझे पूरी याद नहीं हैं पर बिजई भाई हरेक मुलाकात मेंअपने हिसाब से याद कराकर मुझे चिढ़ाते हैं।
दादी या जिन्हें हम "इया " समझाती थी की हम सबसे ज्यादा गर किसी से सीखते हैं तो सोहबत से। शायद उस टीवी राजनीतिक वाद -विवाद परिचालक पर राजनीतिज्ञों की लंबी चुनावी सोहबत का असर होगा।
करीब दस साल पहले उस गैराज कि जगह मैंने कुछ दुकाने बनवा दी हैं , बिजई भाई से कुछ दुनियादारी मैंने भी कम -उम्र में सीखी थी। हाँ , गैराज और उसके पीछे वाली लाल अमरुद , अमड़ा, शरीफ़ा और गुलाइची फुल वाले पेड़।, जिन पे कुदते फाँदते मैं और शायद मेरे पिताजी भी ,अपने मुस्टंडों को न दिखा पाउँगा। न जाने क्यूँ इस अंक का पाठ पिताजी के लिए करने की इच्छा नहीं हो रही।