यह ब्लॉग हिंदी के दो पत्रकारों के प्रोत्साहन से ही लिख पाया। त्रुटियाँ भाषा की और भावनाओ का कमज़ोर प्रवाह तो इस layman ब्लॉगर को भी स्पष्ट हैं ,फिर भी इन दोनों कि भेट।
छः महीने में दो बार घर जाना पड़ा, काम ही कुछ ऐसा था। दुसरी बार जाने पर चौक पर चाय पीते पता चला कि महेसर चा नहीं रहें। एक झटका सा लगा ,पुछने पर पता चला की सोते समय गुज़र गए। चौक कि दूसरी दुकान पर मोहम्मद जान चा दिख गए ,बेंच पर अकेले बैठे थे ,अखबार पढ़ते हुए। तुलसी ने बताया की तक़रीबन दस दिन बाद दीखे हैं ज्ञान बाबू चौक पर। दुआ सलाम करने गया आया कि तो महसूस हो गया कि इनकी लौ भी ज्यादा की न है , जिगरी जो जा चुका है। दोनों की दोस्ती के बारे में और कभी लिखूंगा , फिलहाल तो महेसर चा का चेहरा ऑखों के सामने से हट नहीं रहा।
कानी और चौथी ऊँगली के बीच सिगरेट पकड़ते थे , कश हमेशा लम्बा ही खीचते थे। अस्सी से ऊपर के होंगे पर दिन भर में दस बारह कप बगैर शक्कर वाली चाय पी लेते थे। मजाल है कोई उनसे राजनीति पर बहस करके उन्हें कुछ नया बता पाये या उनसे जीत पाएं। चौक के कई दिग्गज ,सूरमा भी घबराते थे उनसे जिरह करने से ,वकालत जो पढ़ी थी उन्होंने। यह अलग बात हैं कि उनकी जिरह कचहरी में उतनी चलती न थी। पुराने साव थे ,बाप दादा कि अर्ज़ी हुयी जायदाद काफी थी। दुकानों से किराया वसूल कर आराम से गुज़ारा चलाते थे। दो लड़कियाँ है , दोनों डॉक्टर है दिल्ली में। पत्नी अंग्रेजी कि रिटायर्ड प्रोफेसर हैं और और अपना फ्लैट ले रखा है दिल्ली में हीं , पर महेसर चा टीक नहीं पाते थे। जब चाची या लड़कियां ज़बरदस्ती करती तो चौक पर बिजली, मच्छर और गंदीगी का बोल ,दिल्ली प्रस्थान करते थे ,पर हफ्ते दिन में फिर वापसी हो जाते थे । जान चा कितनी बार उनसे राजनीतिक बहस जीत जाते थे उनके इस भगोड़ेपन का हवाला देकर । चौक पर ये भी हल्ला था कि चाची उनके चाय कि आदत से परेशान होकर उनकी मोतिहारी भागने कि अर्ज़ी मंज़ूर कर देती थी। मैंने भी एक बार उनसे पूछा था तो मुस्कराते हुए बोले कि कबूतर खाने में दम घुटता हैं ,डर लगता है कि कही बालकनी से ढिमला न जाऊ। उसपर से ससुर टहलने निकलो तो ये पोस्ट्राट ग्लैंड वाली बीमारी ससुरी और दिल्ली मेंखुले जगह कि किल्लत।
मेर बड़े चाचा को वो अपना मित्र बताते थे हालाँकि दोनों पक्छ इसपर सहमत न थे। मित्र कहे या मोहल्ले वाला , सुबह कि एक कप चाय हमारे दालान में तो उनकी बनती थी। हाते के अंदर घुसते हुए चिल्लायेंगे "बिरेन्दर बाबु है " , मुव्वकील भी मुसुकुरा उठेंगे। "लिप्टन" वाली चाय का फरमान देकर ,साइड चेयर पर बैठ कर अंग्रेजी अख़बार को वसुल लेते थे महेसर चा , चाय में देरी होने पर एक आध बार डाक भी लगा देते थे। हाँ , आते आते अंग्रेजी का कक भारी भरकम शब्द लाना न भूलते। बैठते ही चाचा की वोकाबुलरी पर एक सवालिया निशान दाग देते, चाचा उन्हें कुछ मतलब बताते तो सुन लेते पर असन्तुष्टा भी दर्शा देंते । चाय पीते वक़्त एक बार और पूछते , सिगरेट जलाते , पीते और आधी बुझाकर फिर डिब्बे में रख देते। निकलने के पहले बोलते " लेकिन बिरेन्दर बाबु ,आप उस वर्ड का एक्सैट तर्जुमा नहीं कर पाए। " चाचा का चेहरा उस समय देखने लायक होता था।
मेरे चचेरे भाई साहब बताते है कि सत्तर के दशक में महेसर चा के हाते में हीं दूरदर्शन प्रसार हेतु और बड़ी वाली डिश एक वैन लगती थी। दो घंटे का प्रसारण होता था , सलमा सुल्तान और जे वी रमण न्यूज़ पढ़ते थे। प्रारम्भ में मोहल्ले के सम्मानित व्यक्ति भी उत्सुकता वश जाते थे और बहुत सारी कुर्सिया लगती थी। धीरे धीरे जब लोगों का जाना कम हो गया तो दो ही कुर्सिया लगती थी , एक महेसर चा की तथा दुसरे उनके मित्र जान चा की।
सुना है कि एक बार वार्ड कमिश्नर के चुनाव में अपने ही भाई के विरुद्ध खड़े हो गए महेसर चा। दोस्तों ने बहुत समझाया , चाची ने यह तक बोला की चाची की नौकरी जो कि मुजफ्फरपुर में थी वहाँ न आयें ,भाईओं ने भी समझाया पर महेसर चा अपनी जिद पर कायम रहें।मेरे चाचा ने समझाने कि कोशिश की और पिताजी ने उन्हें फ़ोन पर बहुत बुरा भला कहां पर वे अटल रहें। मोहल्ले के कुछ निट्ठलों ने भड़का दिया था। घर सदाव्रत आश्रम में तब्दील हो गया , चाय ,खाना पानी छुटभैयों की वही जम गयी। भाई पुराने राजनीतिज्ञ थे , महेसर चा पहली बार खड़े हुए थे किसी चुनाव में, मुक़ाबला कैसा। यही सोच कर उनके भाई ने सपत्नीक आपना मत महेसर भाई को दे दिया। गणना हुई तो महेसर चा एक मत से जीत गए, पुनर्गणना कि प्रक्रिया तीन बार हुई लेकिन नतीज़ा बरक़रार रहा। मोहल्ले के सारें मुफतखोर अभी आगाज़ समझ रहे थे और अगले दिन जश्न की तैय्यारी पर चर्चा में लीन थे, तभी खबर आयी कि महेसर चा अपने मित्र' मोहम्मद जा चा के साथ म्युनिसिपेलिटी कार्यालय में निर्वाचन अधिकारी के साथ मिलकर चौक की ओऱ रवाना हुए हैं , उनके साथ उनके भाई भी हैं। पता ये भी चला लोगों को कि महेसर चा ने म्युनिसिपल बॉडी का सदस्य बनने से इंकार कर दिया था। बड़की अम्मा बताती थी कि उसके बाद वालें दिन महेसर चा दो बार ग्रीन लेबल वाली लिप्टन चाय की फरमाईश की थी।
छः महीने में दो बार घर जाना पड़ा, काम ही कुछ ऐसा था। दुसरी बार जाने पर चौक पर चाय पीते पता चला कि महेसर चा नहीं रहें। एक झटका सा लगा ,पुछने पर पता चला की सोते समय गुज़र गए। चौक कि दूसरी दुकान पर मोहम्मद जान चा दिख गए ,बेंच पर अकेले बैठे थे ,अखबार पढ़ते हुए। तुलसी ने बताया की तक़रीबन दस दिन बाद दीखे हैं ज्ञान बाबू चौक पर। दुआ सलाम करने गया आया कि तो महसूस हो गया कि इनकी लौ भी ज्यादा की न है , जिगरी जो जा चुका है। दोनों की दोस्ती के बारे में और कभी लिखूंगा , फिलहाल तो महेसर चा का चेहरा ऑखों के सामने से हट नहीं रहा।
कानी और चौथी ऊँगली के बीच सिगरेट पकड़ते थे , कश हमेशा लम्बा ही खीचते थे। अस्सी से ऊपर के होंगे पर दिन भर में दस बारह कप बगैर शक्कर वाली चाय पी लेते थे। मजाल है कोई उनसे राजनीति पर बहस करके उन्हें कुछ नया बता पाये या उनसे जीत पाएं। चौक के कई दिग्गज ,सूरमा भी घबराते थे उनसे जिरह करने से ,वकालत जो पढ़ी थी उन्होंने। यह अलग बात हैं कि उनकी जिरह कचहरी में उतनी चलती न थी। पुराने साव थे ,बाप दादा कि अर्ज़ी हुयी जायदाद काफी थी। दुकानों से किराया वसूल कर आराम से गुज़ारा चलाते थे। दो लड़कियाँ है , दोनों डॉक्टर है दिल्ली में। पत्नी अंग्रेजी कि रिटायर्ड प्रोफेसर हैं और और अपना फ्लैट ले रखा है दिल्ली में हीं , पर महेसर चा टीक नहीं पाते थे। जब चाची या लड़कियां ज़बरदस्ती करती तो चौक पर बिजली, मच्छर और गंदीगी का बोल ,दिल्ली प्रस्थान करते थे ,पर हफ्ते दिन में फिर वापसी हो जाते थे । जान चा कितनी बार उनसे राजनीतिक बहस जीत जाते थे उनके इस भगोड़ेपन का हवाला देकर । चौक पर ये भी हल्ला था कि चाची उनके चाय कि आदत से परेशान होकर उनकी मोतिहारी भागने कि अर्ज़ी मंज़ूर कर देती थी। मैंने भी एक बार उनसे पूछा था तो मुस्कराते हुए बोले कि कबूतर खाने में दम घुटता हैं ,डर लगता है कि कही बालकनी से ढिमला न जाऊ। उसपर से ससुर टहलने निकलो तो ये पोस्ट्राट ग्लैंड वाली बीमारी ससुरी और दिल्ली मेंखुले जगह कि किल्लत।
मेर बड़े चाचा को वो अपना मित्र बताते थे हालाँकि दोनों पक्छ इसपर सहमत न थे। मित्र कहे या मोहल्ले वाला , सुबह कि एक कप चाय हमारे दालान में तो उनकी बनती थी। हाते के अंदर घुसते हुए चिल्लायेंगे "बिरेन्दर बाबु है " , मुव्वकील भी मुसुकुरा उठेंगे। "लिप्टन" वाली चाय का फरमान देकर ,साइड चेयर पर बैठ कर अंग्रेजी अख़बार को वसुल लेते थे महेसर चा , चाय में देरी होने पर एक आध बार डाक भी लगा देते थे। हाँ , आते आते अंग्रेजी का कक भारी भरकम शब्द लाना न भूलते। बैठते ही चाचा की वोकाबुलरी पर एक सवालिया निशान दाग देते, चाचा उन्हें कुछ मतलब बताते तो सुन लेते पर असन्तुष्टा भी दर्शा देंते । चाय पीते वक़्त एक बार और पूछते , सिगरेट जलाते , पीते और आधी बुझाकर फिर डिब्बे में रख देते। निकलने के पहले बोलते " लेकिन बिरेन्दर बाबु ,आप उस वर्ड का एक्सैट तर्जुमा नहीं कर पाए। " चाचा का चेहरा उस समय देखने लायक होता था।
मेरे चचेरे भाई साहब बताते है कि सत्तर के दशक में महेसर चा के हाते में हीं दूरदर्शन प्रसार हेतु और बड़ी वाली डिश एक वैन लगती थी। दो घंटे का प्रसारण होता था , सलमा सुल्तान और जे वी रमण न्यूज़ पढ़ते थे। प्रारम्भ में मोहल्ले के सम्मानित व्यक्ति भी उत्सुकता वश जाते थे और बहुत सारी कुर्सिया लगती थी। धीरे धीरे जब लोगों का जाना कम हो गया तो दो ही कुर्सिया लगती थी , एक महेसर चा की तथा दुसरे उनके मित्र जान चा की।
सुना है कि एक बार वार्ड कमिश्नर के चुनाव में अपने ही भाई के विरुद्ध खड़े हो गए महेसर चा। दोस्तों ने बहुत समझाया , चाची ने यह तक बोला की चाची की नौकरी जो कि मुजफ्फरपुर में थी वहाँ न आयें ,भाईओं ने भी समझाया पर महेसर चा अपनी जिद पर कायम रहें।मेरे चाचा ने समझाने कि कोशिश की और पिताजी ने उन्हें फ़ोन पर बहुत बुरा भला कहां पर वे अटल रहें। मोहल्ले के कुछ निट्ठलों ने भड़का दिया था। घर सदाव्रत आश्रम में तब्दील हो गया , चाय ,खाना पानी छुटभैयों की वही जम गयी। भाई पुराने राजनीतिज्ञ थे , महेसर चा पहली बार खड़े हुए थे किसी चुनाव में, मुक़ाबला कैसा। यही सोच कर उनके भाई ने सपत्नीक आपना मत महेसर भाई को दे दिया। गणना हुई तो महेसर चा एक मत से जीत गए, पुनर्गणना कि प्रक्रिया तीन बार हुई लेकिन नतीज़ा बरक़रार रहा। मोहल्ले के सारें मुफतखोर अभी आगाज़ समझ रहे थे और अगले दिन जश्न की तैय्यारी पर चर्चा में लीन थे, तभी खबर आयी कि महेसर चा अपने मित्र' मोहम्मद जा चा के साथ म्युनिसिपेलिटी कार्यालय में निर्वाचन अधिकारी के साथ मिलकर चौक की ओऱ रवाना हुए हैं , उनके साथ उनके भाई भी हैं। पता ये भी चला लोगों को कि महेसर चा ने म्युनिसिपल बॉडी का सदस्य बनने से इंकार कर दिया था। बड़की अम्मा बताती थी कि उसके बाद वालें दिन महेसर चा दो बार ग्रीन लेबल वाली लिप्टन चाय की फरमाईश की थी।
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