Wednesday, 26 February 2014

छूटता बंधन-2

यह ब्लॉग हिंदी के दो पत्रकारों के प्रोत्साहन से ही लिख पाया। एक मेरे ही शहर के रहने वाले तथा दुसरे ने इंग्लिश ट्वीट पढ़ना बंद करने की घोषणा की है।  त्रुटियाँ भाषा की और भावनाओ का  कमज़ोर प्रवाह  तो इस layman ब्लॉगर को भी स्पष्ट हैं ,फिर भी इन दोनों कि भेट। 

"भाषा का उपयोग और भारतीय  चुनाव " , विषय पर लेख तो पत्रकार और विश्लेशक तो लिखेंगे ही।
चुनाव दर चुनाव ,भाषा का बदलाव तो मेरे  जैसे "खाकसार" वोटर भी महसूस कर रहे है। शिखण्डी , पच्चास करोड़ , मौत  का सौदागर , खून  की  खेती  आदि  आदि तो इन विश्लेस्को और पत्रकारो की मस्तिस्क से भी परे निकला। ये विवाद का विषय हमेशा से रहा की नेताओं के भाषण में पत्रकारों और विश्लेस्को  का कितना योगदान रहता है। सामाजिक , आर्थिक  और  व्यवहारिक  परिस्तिथियाँ तो मायने रखती ही है।

मुआफी की चर्चा भी  चुनाव के सन्दर्भ  में काफी जोरों पर है। समुदाय विशेष की तुष्टिकरण भी एक मुद्दा है।
जातिगत राजनीति कि आवश्यकता  तो हम जैसे भी समझ पाते है। छेत्रीय उन्माद उकसा कर वोट बैंक का विस्तार भी पिछले दो दशको से काफी चर्चा में है। भिन्न भिन्न प्रकार के विभाजन वाले हथकण्डे कुछ नया  ध्रुवीकरण  करने  में निश्चित रूप से समर्थ है।  राजनीति विभाजन का नया जरिया तलाश रही है।  जात ,धर्म, छेत्र के परे कुछ नया खोज लेगी ,यह कहना कोई अतिश्योक्तिी न हो।

हमारी ये परिपक्य सोच कि सामाजिक सौहार्द की चिंता सिर्फ हम जैसे अध्-कचरे ज्ञान वालों तक आकर थम जाती है विरोधाभास से लिप्त है। ये सोच स्वः घोषित  अभिजात्य वर्ग में ज्यादा बहस कराती है किंतु  समाज के सब तकबो में सामान रूप  से इसकी विवेचना होती है।

ज्ञान बाबू  चौक पर भी होती थी। बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते थे मोहम्मद जान चा और महेसर चा , या यूँ कह लीजिए की सूत्रधार थे कई विवेचनाओं के। रिक्श्ा वाले ,दिहाड़ी मज़दूर ,पास में रहने वाले टमटम वाले, बैंड वाले ,दुध बेचकर गाँव की तरफ लौटते हुए "राय जी ", गोपाल शाह उच्च विद्द्यालय के शिक्षक ,दफ्तरों से घर लौटते हुए मुलाजिम   कुछ  क्षण के लिए तुलसी की चाय दुकान पर रुक कर इन दो मित्रों की विवेचना  बहस को सुनते थे।  निठल्लो  की तो बात छोड़िये ,उनका तो अड्डा ही पास में था। उनकी जमात तो वही मड़राते थी जैसे महेसर चा और उनके सरीखे कुछ लोग शमाँ हो और ये निठल्ले परवाने। आज न जाने क्यूँ  उत्तर मिलता सा प्रतीक होता है कि तुलसी कुढ़ता तो बहुत था इस मजलिस से  पर प्रतिवाद क्यूँ ना करता था। ये समझ लेना जरूरी की इन दो महानुभावो से उसकी बिक्री में चार चाँद लगे , ऐसा न होता था। हाँ कुछ और लोग  अपना काम अकाज करके मज्मा बनाये रखते।

सभ्रांत व्यक्ति गण जब आठ -एक बजे शाम में घर के लिए  निकलने लगते तब एक अलग तरह की चहलकदमी दिखती। हेनरी बाज़ार व गुदड़ी बाज़ार के सोने -चाँदी के आभूषण व्यापारी और कपड़ा के थोक व्यापारी ,जो देर शाम तक दुकान खुला नहीं रख सकते  चौक पर अपनी उपस्तिथि जत्ता देते। ज्ञान बाबु चौक पर चार -पाँच होटल भी है। महेसर चा भी दो एक दिन में वहाँ बैठकी लगाते। मेरे शहर कि "ताश " मशहूर है। सामिष  पकवान है , गोश्त की , मय पसंद लोगों की खूब भाती  है। " बिसनाथ जी की ताश की  दुकान के नए नए संस्करण मिल जायेंगे पुराने शहर में।  गुदड़ी बाज़ार और मिस्कौट के पास वाली ओरिजिनल दुकान उनका भतीजा चलाता है।

ताश घरों में नहीं बनायीं जाती , छोटे होटलो में ही बेची जाती है। गोश्त को सुबह मसालो से मैरिनेट किया जाता है और शाम में मटन की चर्बी में ही भुना जाता है। भोजन प्रेमी ये प्रमाणित कर देंगे  कि बगैर तेल,प्याज अदरख ,लहसुन के माँस बनाना एक कला के बराबर ही है। मैंने चम्पारण के अलावा कही "ताश " बिकते हुए नहीं देखा है ना ही उस तरह की विधि से मटन बनते सुना है।

बगडू भाई भी शामिल होते थे। नाम तो वैसे लल्लन प्रसाद था पर चम्पारण में मूक-वघिर को ज्यादातर 'बागड़ ' ही बोलते है। ऐसे लोगों की संख्या काफी थी चम्पारण में  , गोइटर (घेघा ) से पीड़ित। आयोडीन के आभाव में ये रोग एक महामारी सा था। आयोडाइसेड नमक के इस्तेमाल और खेसारी ( ग्रास पी,लेग्यूम ) दाल के इस्तेमाल  पर रोक लगाने से अब इस  महामारी रुपी बीमारी का प्रकोप कम हुआ है। लथरईस्म एक अलग प्रकोप था इस दाल का।
Lathyrism is a neurological condition, a form of spastic disease ,  victims suffer paralysis in the lower limbs. Presently, the disease is reported to be prevalent in India, Bangladesh and Ethiopia. The consumption of the Khesari was banned in 1961 as it was believed that  a neurotoxic amino-acid in the legume, is responsible for Lathyrism. However, there is no ban on sale of Khesari dal in Chhattisgarh, Maharashtra and West Bengal.

महेसर चा के हम निवाला, जान चा हम प्याला कभी कभार ही होते पर हर मजलिस में हाज़िरी जरूर लगाते और अपने मित्र कि मय की मात्रा पर नज़र जरूर रखते। पुराने खिलाडी थे महेसर चा ,नशे में  कभी लड़खड़ाते ,चिल्लाते  या बदज़बानी करते हुए न देखा या सुना था। तुलसी ने बताया था कि जगत -प्रश्थान के दो दिन पहले भी सदाव्रत बैठकी लगी थी ,कुछ मुफ़्त्खोर निठल्लो के साथ।

नब्बे के दशक के शुरुवात में जब पूरे उत्तर भारत में राजनीतिक ध्रुवुकरण का उन्माद अपनी प्रकाष्ठा पर था तो चौक पर एक ख़ास समुदाय के लोगो का आना जाना चौक पर कम हो गया था। ऐसे भी में ये दोनों मित्र राजनीति या धार्मिक बहस से न घबराते थे। तुलसी बताता है कि जितना भद्दा मजाक एक दुसरे के समुदाय पर ये दो विश्लेषज्ञ करते थे उससे चौक का माहौल बिगड़ने का खतरा बन जाता। संस्कृत के गोपाल शाह विद्यालय के मास्साब दोनों पर भकुटी तानते पर दोनों मानते कहाँ थे। एक बार दोनों से इस विषय में पूछा तो जान चा ने कहा भाई तुम जैसो कि सोचने की शक्ति हमसे ज्यादा है  पर हमारी मेंटल (दिमागी) फ्यूज का रेटिंग अम्पारीएज ज्यादा है।

Saturday, 15 February 2014

छूटता बंधन

यह ब्लॉग हिंदी के दो पत्रकारों के प्रोत्साहन से ही लिख पाया।  त्रुटियाँ भाषा की और भावनाओ का  कमज़ोर प्रवाह  तो इस layman ब्लॉगर को भी स्पष्ट हैं ,फिर भी इन दोनों कि भेट। 

छः   महीने में दो बार घर जाना पड़ा, काम ही कुछ ऐसा था। दुसरी बार जाने पर चौक पर चाय पीते पता चला कि महेसर चा नहीं रहें। एक झटका सा लगा ,पुछने पर पता चला की सोते समय गुज़र गए।  चौक कि दूसरी दुकान पर मोहम्मद जान चा दिख गए ,बेंच पर अकेले बैठे थे ,अखबार पढ़ते हुए। तुलसी ने बताया की तक़रीबन दस दिन बाद दीखे हैं ज्ञान बाबू चौक पर। दुआ सलाम  करने गया आया कि तो महसूस हो गया कि इनकी लौ भी ज्यादा की न है , जिगरी जो जा चुका है। दोनों की दोस्ती के बारे में और कभी लिखूंगा , फिलहाल तो महेसर चा का चेहरा ऑखों के सामने से हट नहीं रहा।

कानी और चौथी ऊँगली के बीच सिगरेट पकड़ते थे , कश हमेशा लम्बा ही खीचते थे। अस्सी से ऊपर के होंगे पर दिन भर में दस बारह कप बगैर शक्कर वाली चाय पी लेते थे। मजाल है कोई उनसे राजनीति पर बहस करके उन्हें  कुछ नया बता पाये या उनसे जीत पाएं। चौक  के कई दिग्गज ,सूरमा भी घबराते थे उनसे जिरह करने से ,वकालत जो पढ़ी थी उन्होंने। यह अलग बात हैं कि उनकी जिरह कचहरी में उतनी चलती न थी। पुराने साव थे ,बाप दादा कि अर्ज़ी हुयी जायदाद काफी थी।  दुकानों से किराया वसूल कर आराम से गुज़ारा चलाते थे। दो लड़कियाँ है , दोनों  डॉक्टर है दिल्ली में। पत्नी अंग्रेजी कि रिटायर्ड प्रोफेसर हैं और और अपना फ्लैट ले रखा है दिल्ली में हीं , पर महेसर चा टीक नहीं पाते  थे। जब  चाची  या लड़कियां ज़बरदस्ती करती तो चौक पर बिजली, मच्छर  और गंदीगी का बोल ,दिल्ली प्रस्थान करते थे ,पर हफ्ते दिन में फिर वापसी हो जाते  थे । जान  चा कितनी बार उनसे राजनीतिक बहस जीत जाते थे उनके इस भगोड़ेपन का हवाला देकर । चौक पर ये भी हल्ला था कि चाची उनके चाय कि आदत से परेशान होकर उनकी  मोतिहारी भागने कि अर्ज़ी मंज़ूर कर देती थी। मैंने भी एक बार उनसे पूछा था तो मुस्कराते हुए बोले कि कबूतर खाने  में दम घुटता हैं ,डर  लगता है कि कही बालकनी से ढिमला न जाऊ। उसपर से  ससुर टहलने निकलो तो ये  पोस्ट्राट ग्लैंड वाली बीमारी ससुरी और दिल्ली मेंखुले जगह कि किल्लत।

मेर बड़े चाचा को वो अपना मित्र बताते  थे हालाँकि दोनों पक्छ इसपर सहमत न थे। मित्र कहे या मोहल्ले वाला , सुबह कि एक कप चाय हमारे दालान में तो उनकी बनती थी। हाते के अंदर घुसते हुए चिल्लायेंगे "बिरेन्दर बाबु है " , मुव्वकील भी मुसुकुरा उठेंगे। "लिप्टन" वाली चाय का फरमान देकर ,साइड  चेयर पर बैठ कर अंग्रेजी अख़बार को  वसुल लेते  थे  महेसर चा , चाय  में देरी होने पर एक आध बार डाक भी लगा देते थे। हाँ , आते आते  अंग्रेजी का कक भारी भरकम शब्द लाना  न भूलते। बैठते ही चाचा की वोकाबुलरी पर एक सवालिया निशान दाग देते, चाचा उन्हें कुछ मतलब बताते तो सुन लेते पर असन्तुष्टा भी दर्शा देंते । चाय पीते वक़्त एक  बार और  पूछते  , सिगरेट  जलाते  , पीते और आधी बुझाकर  फिर  डिब्बे में  रख  देते। निकलने  के पहले बोलते  " लेकिन  बिरेन्दर बाबु ,आप  उस वर्ड का एक्सैट  तर्जुमा नहीं कर पाए। " चाचा का चेहरा उस  समय देखने लायक होता था।

मेरे  चचेरे भाई साहब  बताते है  कि  सत्तर के दशक में महेसर चा के हाते में हीं दूरदर्शन प्रसार हेतु  और बड़ी वाली डिश एक वैन लगती थी। दो  घंटे का प्रसारण  होता था , सलमा सुल्तान  और जे वी रमण  न्यूज़ पढ़ते थे। प्रारम्भ में मोहल्ले के सम्मानित व्यक्ति भी  उत्सुकता वश जाते थे और बहुत सारी कुर्सिया लगती थी।  धीरे धीरे जब लोगों का जाना कम हो गया तो दो ही  कुर्सिया लगती थी , एक  महेसर चा की  तथा  दुसरे उनके  मित्र जान चा की।

सुना है कि एक बार वार्ड कमिश्नर के चुनाव में अपने ही भाई के विरुद्ध खड़े हो गए महेसर चा।  दोस्तों ने बहुत समझाया , चाची ने यह तक बोला की चाची की  नौकरी  जो  कि मुजफ्फरपुर में थी वहाँ न आयें ,भाईओं  ने  भी समझाया पर  महेसर  चा  अपनी जिद पर  कायम रहें।मेरे चाचा ने समझाने कि कोशिश की  और पिताजी ने उन्हें फ़ोन पर बहुत बुरा भला कहां पर वे अटल रहें।  मोहल्ले के कुछ निट्ठलों ने भड़का दिया था। घर  सदाव्रत  आश्रम में तब्दील हो गया , चाय ,खाना पानी  छुटभैयों की वही जम गयी। भाई पुराने राजनीतिज्ञ थे , महेसर चा पहली बार खड़े हुए थे किसी चुनाव में, मुक़ाबला कैसा।  यही  सोच कर  उनके भाई ने सपत्नीक आपना मत  महेसर भाई को दे दिया। गणना हुई  तो महेसर चा एक मत से जीत गए, पुनर्गणना  कि प्रक्रिया तीन बार हुई लेकिन नतीज़ा बरक़रार  रहा। मोहल्ले के सारें मुफतखोर अभी आगाज़ समझ रहे थे और अगले दिन जश्न की तैय्यारी पर चर्चा में लीन थे,  तभी खबर आयी कि महेसर चा अपने मित्र' मोहम्मद जा चा के  साथ म्युनिसिपेलिटी  कार्यालय में निर्वाचन अधिकारी के साथ मिलकर चौक की ओऱ रवाना हुए हैं , उनके साथ  उनके भाई भी हैं। पता  ये  भी चला लोगों को कि महेसर चा ने म्युनिसिपल बॉडी का सदस्य बनने से इंकार कर दिया था। बड़की अम्मा बताती थी कि उसके बाद वालें दिन महेसर चा  दो बार ग्रीन लेबल वाली लिप्टन चाय की फरमाईश की थी।